योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ 1.23 ॥
मैं उन लोगों को देखना चाहता हूँ जो यहाँ युद्ध करने के लिए एकत्र हुए हैं, और जो इस दुर्बुद्धि दुर्योधन (धृतराष्ट्र के पुत्र) को युद्ध में प्रसन्न करना चाहते हैं।
विस्तार: अर्जुन यहाँ दुर्योधन को 'दुर्बुद्धि' कहकर उसके अधर्म को स्पष्ट करता है। वह उन सभी राजाओं और योद्धाओं को देखना चाहता है जो जानते हुए भी धर्म के मार्ग पर नहीं हैं और दुर्योधन का पक्ष ले रहे हैं। अर्जुन का यह कथन उसकी बढ़ती हुई नैतिक दुविधा को दर्शाता है।