भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति ॥ 1.25 ॥
भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने तथा अन्य सभी राजाओं के सामने रथ को स्थापित करके श्रीकृष्ण ने कहा: हे पार्थ (अर्जुन)! युद्ध के लिए एकत्र हुए इन सभी कौरवों को देखो।
विस्तार: श्रीकृष्ण ने रथ को जानबूझकर भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने रोका, जो अर्जुन के सबसे पूज्यनीय थे। ऐसा करके श्रीकृष्ण अर्जुन के मोह और कर्तव्य के बीच के संघर्ष को चरम पर पहुँचाना चाहते थे। 'पार्थ' (पृथापुत्र) कहकर श्रीकृष्ण अर्जुन को उसके महान् जन्म की याद दिलाते हैं।