कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।
अर्जुन उवाच ।
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥ 1.28 ॥
उन सभी सम्बन्धियों को देखकर, वह अत्यधिक करुणा (दया) से भर गया और दुःख (विषाद) प्रकट करते हुए यह वचन कहा। अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण! युद्ध करने की इच्छा से यहाँ उपस्थित इस अपने ही स्वजनों के समूह को देखकर...
विस्तार: यह वह क्षण है जब अर्जुन का मोह चरम पर पहुँच जाता है। 'कृपया परयाविष्टो' (अत्यधिक करुणा से अभिभूत) होना उसके युद्ध करने के संकल्प को डिगा देता है। उसका दुःख केवल डर से नहीं, बल्कि अपने ही प्रियजनों को मारने की नैतिक चिंता से उपजा है। यहाँ से वह श्रीकृष्ण के सामने अपनी दुविधा रखना शुरू करता है।