गाण्डीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥ 1.30 ॥
(मेरा) गाण्डीव धनुष हाथ से फिसला जा रहा है, और मेरी त्वचा भी जल रही है। मैं खड़ा रहने में भी असमर्थ हूँ और मेरा मन भ्रमित हो रहा है।
विस्तार: अर्जुन की शारीरिक कमजोरी अब उसके प्रसिद्ध हथियार तक पहुँच गई है। 'गाण्डीव' धनुष का हाथ से फिसलना उसकी योद्धा के रूप में पहचान और संकल्प के डगमगाने का प्रतीक है। मन का भ्रमित होना यह दिखाता है कि वह निर्णय लेने की शक्ति खो चुका है। यह विषाद अर्जुन को कर्म से विमुख कर रहा है।