येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणान्स्त्यक्त्वा धनानि च ॥ 1.33 ॥
जिनके लिए हम राज्य, भोग और सुख चाहते हैं, वे सभी (अपने) प्राणों और धन की आशा छोड़कर युद्ध के मैदान में मेरे सामने खड़े हैं।
विस्तार: अर्जुन तर्क देता है कि यदि वे अपने प्रियजनों को मारकर ही राज्य प्राप्त करते हैं, तो उस राज्य का उपभोग करने वाला कौन बचेगा? उसके लिए राज्य और सुख का अर्थ अपने परिवार के साथ मिलकर उपभोग करना था। जब वे ही शत्रु बनकर सामने खड़े हैं, तो विजय का कोई मूल्य नहीं रह जाता।