तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥ 1.37 ॥
इसलिए हमें धृतराष्ट्र के पुत्रों, जो हमारे ही संबंधी हैं, उन्हें मारना उचित नहीं है। हे माधव! अपने ही स्वजनों को मारकर हम कैसे सुखी हो सकते हैं?
विस्तार: अर्जुन अपनी दलील का सारांश देता है। वह जोर देकर कहता है कि 'स्वजन' (अपने लोग) को मारना किसी भी कीमत पर सुख या धर्म नहीं लाएगा। 'माधव' (श्रीकृष्ण) कहकर वह एक बार फिर अपने मार्गदर्शक को स्थिति की गंभीरता का एहसास कराता है। यह श्लोक उसके पक्ष को नैतिक आधार देता है।