यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥ 1.38 ॥
यद्यपि लोभ से भ्रष्ट बुद्धि वाले ये लोग कुल का नाश करने से होने वाले दोष और मित्रद्रोह के पाप को नहीं देख रहे हैं,
विस्तार: अर्जुन यहाँ कौरवों की आलोचना करता है कि वे केवल लालच (लोभ) के कारण अंधे हो गए हैं और अपने दुष्कर्मों (कुल-नाश और मित्रद्रोह) के परिणामों को नहीं देख पा रहे हैं। अर्जुन मानता है कि कौरव अधर्मी हैं, लेकिन पाण्डव धर्मी हैं और उन्हें ऐसा पाप नहीं करना चाहिए।