सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ 1.42 ॥
वर्णसंकर (अवांछित संतान) कुलघातियों और कुल दोनों को ही नरक में ले जाते हैं। ऐसे वंशों के पितर (पूर्वज) भी जल और पिण्डदान की क्रिया लुप्त हो जाने के कारण (अधोगति को प्राप्त होकर) नरक में गिरते हैं।
विस्तार: अर्जुन अब युद्ध के आध्यात्मिक परिणामों की बात करता है। उसका मानना है कि वर्णसंकर से केवल वर्तमान समाज ही नहीं, बल्कि पूर्वजों का भी पतन होता है। पूर्वजों को शांत रखने के लिए किए जाने वाले अनुष्ठान (पिण्डदान, जल) बंद हो जाने पर, उन्हें मुक्ति नहीं मिलती, और वे नरक में चले जाते हैं। यह विचार अर्जुन की गहरी धार्मिक आस्था को दर्शाता है।