दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः ।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ 1.43 ॥
इन कुलघातियों के वर्णसंकर उत्पन्न करने वाले दोषों से सनातन जाति-धर्म और कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं।
विस्तार: यह श्लोक पिछले तर्कों को सारांशित करता है। अर्जुन का अंतिम निष्कर्ष है कि कुल का नाश होने से (जिसे वह युद्ध का अपरिहार्य परिणाम मानता है), समाज के आधारभूत नियम (जाति-धर्म, जो सामाजिक नियम हैं; और कुल-धर्म, जो पारिवारिक और धार्मिक परंपराएँ हैं) नष्ट हो जाएँगे। इस तरह की धर्म-हानि से समाज का आधार ही ढह जाएगा।