अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यता: ॥ 1.45 ॥
अहो! बड़े दुख की बात है कि हम लोग (पाण्डव) बड़ा पाप करने के लिए तैयार हो गए हैं; जो हम राज्य के सुख के लोभ से अपने ही स्वजनों को मारने के लिए तत्पर हो गए हैं।
विस्तार: यह श्लोक अर्जुन की आत्मग्लानि और आत्म-आलोचना को दर्शाता है। वह अपने ही मन में युद्ध को 'महापाप' मानता है और अपने भाइयों के साथ खुद को भी राज्य के सुख के 'लोभ' से प्रेरित मानता है, भले ही उनके इरादे धार्मिक न्याय के लिए हों। यह श्लोक उसकी भावना और कर्तव्य के बीच के संघर्ष को दिखाता है।