॥ अध्याय 10, श्लोक 10 ॥

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ 10.10 ॥

धार्मिक व्याख्या

कृष्ण कहते हैं: उन निरंतर मुझमें लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तों को मैं वह बुद्धियोग प्रदान करता हूँ, जिससे वे मुझे प्राप्त कर लेते हैं।

आध्यात्मिक मर्म: यह बहुत महत्वपूर्ण है! कृष्ण कह रहे हैं कि आपको खुद को बहुत ज्यादा ज्ञानी होने की जरूरत नहीं है; बस प्रेम और निरंतरता (Consistency) रखिए। वह 'बुद्धि' (Right Understanding) जिससे सत्य तक पहुँचा जाता है, भगवान खुद अंदर से गिफ्ट के रूप में देते हैं।

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