स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥
हे पुरुषोत्तम! हे भूतों को उत्पन्न करने वाले! हे भूतों के ईश्वर! हे देवों के देव! हे जगत्पति! आप स्वयं ही अपने से अपने आपको जानते हैं।
आध्यात्मिक मर्म: भगवान को केवल भगवान ही जान सकते हैं। मनुष्य अपनी बुद्धि से केवल उतना ही जान सकता है जितना भगवान उसे बताना चाहते हैं।