॥ अध्याय 10, श्लोक 17 ॥

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥

धार्मिक व्याख्या

हे योगेश्वर! मैं निरंतर चिंतन करता हुआ आपको कैसे जानूँ? और हे भगवन! किन-किन भावों में मेरे द्वारा आपका चिंतन किया जाना चाहिए?

आध्यात्मिक मर्म: यह एक जिज्ञासु का प्रश्न है जो हर पल भगवान की याद में रहना चाहता है।

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