विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥
हे जनार्दन! अपनी योगशक्ति और विभूति को फिर से विस्तार से कहें, क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं हो रही है।
आध्यात्मिक मर्म: ज्ञान की भूख ही महानता की ओर ले जाती है। जब तक ज्ञान प्राप्त करने में 'अमृत' जैसा स्वाद न आए, तब तक पढ़ाई बोझ लगती है।