श्रीभगवानुवाच :
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥
श्रीभगवान बोले: हे कुरुश्रेष्ठ! अब मैं तुझसे अपनी दिव्य विभूतियों को मुख्य रूप से कहूँगा, क्योंकि मेरे विस्तार का कोई अंत नहीं है।
आध्यात्मिक मर्म: भगवान यहाँ 'प्राधान्यतः' (मुख्य रूप से) कह रहे हैं, क्योंकि अनंत को पूर्ण रूप से बताना संभव नहीं है।