महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥
कृष्ण कहते हैं: मैं महर्षियों में भृगु हूँ, शब्दों में एक अक्षर 'ॐ' (ओंकार) हूँ, सब प्रकार के यज्ञों में जप-यज्ञ हूँ और स्थिर रहने वालों में हिमालय पर्वत हूँ।
आध्यात्मिक मर्म: जप-यज्ञ सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि इसमें किसी बाहरी सामग्री की आवश्यकता नहीं होती, केवल मन की शुद्धि चाहिए। हिमालय की तरह अडिग रहना ही आपके अनुशासन (Discipline) का सबसे बड़ा प्रमाण है।