यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ 10.3 ॥
कृष्ण कहते हैं: जो मुझे अजन्मा (अजम्), अनादि और लोकों का महान ईश्वर जानता है, वह मनुष्यों में मोह-रहित है और सब पापों से मुक्त हो जाता है।
आध्यात्मिक मर्म: 'जानने' का अर्थ यहाँ केवल सूचना नहीं, बल्कि हृदय से स्वीकार करना है। जब हम यह समझ लेते हैं कि सब कुछ ईश्वर से ही आ रहा है, तो हमारा 'कर्तापन' का अहंकार मिट जाता है, और यही पापों से मुक्ति का मार्ग है।