॥ श्लोक 30 ॥

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥

धार्मिक व्याख्या

कृष्ण कहते हैं: मैं दैत्यों में प्रह्लाद हूँ, गणना करने वालों में समय (काल) हूँ, पशुओं में सिंह हूँ और पक्षियों में गरुड़ हूँ।

आध्यात्मिक मर्म: प्रह्लाद असुर कुल में होने के बाद भी परम भक्त थे। भगवान गुणों को देखते हैं, कुल को नहीं। समय सबसे बलवान है, और वह भी साक्षात भगवान का ही रूप है।

← वापस जाएँ