सर्गाणामदिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥
कृष्ण कहते हैं: हे अर्जुन! मैं सृष्टियों का आदि, अंत और मध्य भी हूँ। विद्याओं में मैं अध्यात्म-विद्या (आत्मज्ञान) हूँ और तर्क करने वालों का संवाद हूँ।
आध्यात्मिक मर्म: दुनिया में अनेक प्रकार की शिक्षाएँ हैं, लेकिन जो मनुष्य को स्वयं की आत्मा से मिलवाए (अध्यात्म-विद्या), वही सर्वश्रेष्ठ है। भगवान इसी ज्ञान के अधिष्ठाता हैं।