॥ श्लोक 33 ॥

अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥

धार्मिक व्याख्या

कृष्ण कहते हैं: मैं अक्षरों में 'अ' कार हूँ, समासों में द्वंद्व समास हूँ, मैं ही अविनाशी काल हूँ और सब ओर मुख वाला धाता (धारण करने वाला) हूँ।

आध्यात्मिक मर्म: जैसे हर भाषा और वर्णमाला 'अ' से शुरू होती है, वैसे ही हर वस्तु का उद्गम ईश्वर है। समय सबको नष्ट कर देता है, लेकिन ईश्वर स्वयं वह काल हैं जो कभी समाप्त नहीं होता।

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