॥ श्लोक 36 ॥

द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ॥

धार्मिक व्याख्या

कृष्ण कहते हैं: मैं छल करने वालों में जुआ हूँ और प्रभावशालियों में तेज हूँ। मैं जीतने वालों की विजय हूँ, प्रयत्न करने वालों का निश्चय हूँ और सात्त्विक पुरुषों का सद्गुण हूँ।

आध्यात्मिक मर्म: इस संसार में जो भी शक्ति, संकल्प और सफलता दिखाई देती है, वह सब ईश्वर की विभूति का ही विस्तार है। दृढ़ निश्चय की शक्ति ईश्वरीय कृपा का ही रूप है।

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