॥ श्लोक 37 ॥

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः ।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥

धार्मिक व्याख्या

कृष्ण कहते हैं: मैं वृष्णि वंशियों में स्वयं वासुदेव हूँ, पाण्डवों में अर्जुन हूँ, मुनियों में वेदव्यास हूँ और विद्वानों में शुक्राचार्य हूँ।

आध्यात्मिक मर्म: भगवान यहाँ अर्जुन को यह अनुभव करा रहे हैं कि उनकी स्वयं की वीरता और कौशल भी ईश्वर की ही देन है। ज्ञान और वीरता की पराकाष्ठा ईश्वर का ही स्वरूप है।

← वापस जाएँ