॥ श्लोक 40 ॥

नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥

धार्मिक व्याख्या

कृष्ण कहते हैं: हे परंतप! मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अंत नहीं है। मैंने तो तुझे अपनी विभूतियों का बहुत थोड़ा सा विस्तार उदाहरण के रूप में बताया है।

आध्यात्मिक मर्म: ईश्वर अनंत हैं और मानव बुद्धि सीमित है। भगवान केवल कुछ संकेत देते हैं ताकि हम उनकी असीमता का अनुमान लगा सकें।

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