यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ॥
कृष्ण कहते हैं: जो-जो भी ऐश्वर्ययुक्त, शोभायुक्त और शक्तिशाली वस्तु है, उस-उस को तू मेरे तेज के एक अंश से ही उत्पन्न जान।
आध्यात्मिक मर्म: संसार में जहाँ भी हम कुछ 'विशेष' या 'अद्भुत' देखते हैं, वह ईश्वर के प्रकाश की एक छोटी सी किरण मात्र है। यह श्लोक हमें हर महान वस्तु में ईश्वर को देखने की दृष्टि देता है।