महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥ 10.6 ॥
कृष्ण कहते हैं: सात महर्षि, उनसे भी पूर्व होने वाले चार सनकादि और चौदह मनु—ये सब मेरे संकल्प से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी इस संसार में ये समस्त प्रजाएँ हैं।
आध्यात्मिक मर्म: पूरी सृष्टि एक ही 'मन' (परमात्मा) का विस्तार है। हम सब उस परम पिता की मानसिक संतानें हैं। यह श्लोक हमें 'वसुधैव कुटुंबकम्' (पूरी दुनिया एक परिवार है) की याद दिलाता है।