लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ 14.12 ॥
हे भरतश्रेष्ठ! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति (लगातार कुछ करने की इच्छा), स्वार्थ बुद्धि से कर्मों का आरम्भ, अशांति और विषय-भोगों की लालसा—ये सब उत्पन्न होते हैं।
विस्तृत व्याख्या: रजोगुण बढ़ने पर व्यक्ति बेचैन हो जाता है। वह हमेशा भविष्य की योजनाएँ बनाता रहता है और कभी संतुष्ट नहीं होता। अधिक पाने की होड़ रजोगुण की ही देन है।