॥ अध्याय 14, श्लोक 19 ॥

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ 14.19 ॥

धार्मिक व्याख्या

जिस समय द्रष्टा (साक्षी पुरुष) गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और गुणों से अत्यंत परे परमात्मा को तत्व से जानता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।

विस्तृत व्याख्या: यहाँ भगवान मुक्ति का रहस्य बता रहे हैं। जब मनुष्य यह समझ जाता है कि शरीर और मन की सारी क्रियाएं वास्तव में प्रकृति के गुणों का ही खेल हैं और वह खुद (आत्मा) इन सबसे अलग है, तब वह अहंकार से मुक्त हो जाता है। वह जान जाता है कि गुणों के पीछे जो परम शक्ति है, वही उसका वास्तविक स्वरूप है।

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