इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ 14.2 ॥
इस ज्ञान को आश्रय बनाकर (जीवन में उतारकर) जो मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं, वे सृष्टि के आदि में पुनः जन्म नहीं लेते और प्रलय काल में भी विचलित (नष्ट) नहीं होते।
विस्तृत व्याख्या: यहाँ 'साधर्म्यम्' का अर्थ है भगवान के दिव्य स्वभाव जैसा हो जाना। जो व्यक्ति इन तीन गुणों के खेल को समझकर उनसे ऊपर उठ जाता है, वह काल के चक्र से मुक्त हो जाता है। उसे न तो संसार के जन्मने की खुशी होती है और न ही प्रलय के विनाश का डर, क्योंकि वह अविनाशी परमात्मा में स्थित हो चुका होता है।