॥ अध्याय 14, श्लोक 22-23 ॥

श्रीभगवानुवाच :
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥

धार्मिक व्याख्या

श्रीभगवान बोले: हे पाण्डव! जो पुरुष सत्वगुण के कार्यरूप प्रकाश को, रजोगुण के कार्यरूप प्रवृत्ति को और तमोगुण के कार्यरूप मोह को—इनके प्रवृत्त होने पर न तो उनसे द्वेष करता है और न ही उनके हटने पर उनकी आकांक्षा करता है। जो उदासीन (Witness) की भाँति स्थित रहता है और गुणों द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता, यह जानकर कि 'गुण ही गुणों में बरत रहे हैं'—वह अपनी स्थिति में स्थिर रहता है और कभी विचलित नहीं होता।

विस्तृत व्याख्या: गुणातीत व्यक्ति भावनाओं के तूफान में भी तटस्थ रहता है। यदि मन में विचार (रज) या आलस्य (तम) आए, तो वह परेशान नहीं होता; वह जानता है कि यह प्रकृति का स्वभाव है, उसका नहीं। वह 'साक्षी भाव' में रहता है।

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