समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥
जो निरंतर आत्म-भाव में स्थित है, जिसके लिए दुःख-सुख समान हैं, जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और सुवर्ण में समान भाव वाला है, जिसके लिए प्रिय और अप्रिय एक से हैं, जो धीर है और अपनी निंदा तथा स्तुति में समान भाव रखता है। जो मान और अपमान में समान है, मित्र और शत्रु के पक्ष में भी समान है तथा जिसने समस्त कर्मों में 'कर्तापन' के अभिमान का त्याग कर दिया है—वही 'गुणातीत' कहा जाता है।
विस्तृत व्याख्या: यह मानसिक संतुलन की पराकाष्ठा है। ऐसे व्यक्ति का सुख बाहरी परिस्थितियों (जैसे धन, प्रशंसा या रिश्तों) पर निर्भर नहीं होता। वह अपने 'स्व' में स्थित (स्वस्थ) रहता है।