॥ अध्याय 14, श्लोक 3-4 ॥

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् ।
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥

धार्मिक व्याख्या

हे भारत! मेरी 'महद्ब्रह्म' रूप मूल प्रकृति समस्त प्राणियों की योनि (माता) है और मैं उसमें चेतन रूप बीज को स्थापित करता हूँ। उस जड़-चेतन के संयोग से ही सब भूतों की उत्पत्ति होती है। हे कुन्तीपुत्र! सब योनियों में जितनी भी मूर्तियाँ (प्राणी) पैदा होती हैं, प्रकृति उन सबकी माता है और मैं बीज देने वाला पिता हूँ।

विस्तृत व्याख्या: यहाँ भगवान सृष्टि का 'बायोलॉजिकल' और 'स्पिरिचुअल' आधार बता रहे हैं। प्रकृति (Material Nature) कच्चा माल प्रदान करती है, और परमात्मा उसमें चेतना (Consciousness) का बीज डालते हैं। इन्हीं के मेल से ब्रह्मांड के हर जीव का जन्म होता है।

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