तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् ।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥ 14.6 ॥
हे निष्पाप अर्जुन! उन तीनों गुणों में 'सत्व गुण' अत्यंत निर्मल होने के कारण प्रकाश करने वाला (ज्ञानयुक्त) और निर्विकार है। वह सुख की आसक्ति और ज्ञान के अभिमान से जीवात्मा को बाँधता है।
विस्तृत व्याख्या: सत्व गुण साफ़ दर्पण की तरह है। यह मनुष्य में शांति, दया और सत्य की खोज बढ़ाता है। लेकिन यह भी एक 'बंधन' है। कैसे? जब व्यक्ति को अपने ज्ञान का अहंकार हो जाता है या वह केवल 'सुखी रहने' के मोह में फँस जाता है, तो वह आत्म-साक्षात्कार के अंतिम लक्ष्य से भटक सकता है। यह एक 'सोने की जंजीर' की तरह है।