सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ॥
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥
सत्व गुण सुख में लगाता है, रजोगुण कर्म में लगाता है और तमोगुण ज्ञान को ढंककर प्रमाद (गलतियों) में लगाता है। कभी सत्व गुण रज और तम को दबाकर बढ़ता है, तो कभी रजोगुण सत्व और तम को दबाकर बढ़ता है, और कभी तमोगुण सत्व और रज को दबाकर अपना प्रभाव दिखाता है।
विस्तृत व्याख्या: हर व्यक्ति के भीतर ये तीनों गुण मौजूद होते हैं, लेकिन उनका अनुपात (Proportion) बदलता रहता है। जब आप शांत और एकाग्र होते हैं (जैसे IIT-Bombay की तैयारी के समय), तब सत्व बढ़ता है। जब आप बहुत उत्तेजित या बेचैन होते हैं, तब रज बढ़ता है। और जब आप आलसी महसूस करते हैं, तब तम बढ़ता है। सफलता के लिए सत्व गुण को प्रधान रखना आवश्यक है।