यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥
हे भारत! जो मोह रहित ज्ञानी पुरुष मुझे इस प्रकार तत्व से 'पुरुषोत्तम' जानता है, वह सब कुछ जानने वाला (सर्वज्ञ) पुरुष सब प्रकार से मुझे ही भजता है। हे निष्पाप अर्जुन! इस प्रकार यह अति रहस्यमय गोपनीय शास्त्र मैंने तुझे कहा है, इसे जानकर मनुष्य बुद्धिमान और कृतार्थ (सफल) हो जाता है।
विस्तृत व्याख्या: भगवान इस अध्याय को 'गुह्यतम' (सबसे अधिक गुप्त) कह रहे हैं। इसका अर्थ यह है कि जिसने पुरुषोत्तम तत्व को समझ लिया, उसे और कुछ जानना शेष नहीं रहता। वह व्यक्ति मानसिक शांति और जीवन की सार्थकता (कृतकृत्यता) को प्राप्त कर लेता है।
॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥
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