यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥
जो पुरुष शास्त्र की विधि को त्याग कर अपनी इच्छा के अनुसार मनमाना आचरण करता है, वह न तो सिद्धि को प्राप्त होता है, न सुख को और न ही परम गति को। इसलिए तेरे लिए 'क्या करना चाहिए' और 'क्या नहीं करना चाहिए'—इसकी व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तुझे शास्त्रविधि से नियत कर्म ही करना चाहिए।
विस्तृत व्याख्या: यहाँ भगवान अनुशासन (Discipline) की बात कर रहे हैं। शास्त्र का अर्थ है वे नियम जो जीवन को सही दिशा देते हैं। यदि हम बिना किसी नियमों के, केवल मन की लहरों पर बहेंगे, तो हम कभी अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाएंगे। कर्तव्य का निर्णय हमेशा विवेक और धर्म के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल व्यक्तिगत पसंद के आधार पर।
॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः ॥
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