न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥ 2.12 ॥
ऐसा कभी नहीं था कि मैं (कृष्ण) नहीं था, या तुम (अर्जुन) नहीं थे, या ये राजा लोग नहीं थे; और न ही ऐसा है कि भविष्य में हम सब नहीं रहेंगे।
विस्तार: कृष्ण यहाँ आत्मा की अमरता और पुनर्जन्म के सिद्धांत की नींव रख रहे हैं। वे समझाते हैं कि व्यक्ति की पहचान केवल वर्तमान शरीर तक सीमित नहीं है। हम पहले भी अस्तित्व में थे और इस शरीर के नष्ट होने के बाद भी हमारा अस्तित्व बना रहेगा।