मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ 2.14 ॥
हे कुन्तीपुत्र! इन्द्रियों और विषयों के संयोग से होने वाले सर्दी-गर्मी और सुख-दुख के अनुभव क्षणभंगुर (आने-जाने वाले) और अनित्य हैं। हे भरतवंशी! इसलिए तुम उन्हें सहन करना सीखो।
विस्तार: भगवान कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि संसार में सुख और दुख स्थायी नहीं हैं। जैसे सर्दी के बाद गर्मी आती है, वैसे ही दुख के बाद सुख आता है। हमें इन द्वंद्वों में विचलित होने के बजाय धैर्यपूर्वक उन्हें सहन करना चाहिए, क्योंकि ये केवल इंद्रियों के अस्थायी अनुभव हैं।