यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ 2.15 ॥
हे पुरुषश्रेष्ठ! जो धीर मनुष्य सुख और दुख में समान रहता है और इन इंद्रिय अनुभवों से विचलित नहीं होता, वह निश्चित रूप से मोक्ष (अमरता) प्राप्त करने के योग्य है।
विस्तार: कृष्ण यहाँ 'स्थितप्रज्ञ' या समत्व के योग की ओर संकेत कर रहे हैं। जो व्यक्ति सुख में बहुत उत्साहित नहीं होता और दुख में टूटता नहीं है, वही आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है। मोक्ष पाने की पहली शर्त ही यह है कि हम बाहरी परिस्थितियों के गुलाम न बनें।