अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥ 2.18 ॥
इस अविनाशी, अप्रमेय (जिसे प्रमाणों से सिद्ध न किया जा सके) और नित्य आत्मा के ये सभी शरीर नाशवान कहे गए हैं। इसलिए हे भारत (अर्जुन)! तुम युद्ध करो।
विस्तार: कृष्ण यहाँ शरीर और आत्मा के अंतर को स्पष्ट कर रहे हैं। शरीर का अंत होना निश्चित है, चाहे वह आज हो या कल। लेकिन जो शरीर के भीतर है (आत्मा), वह हमेशा रहेगा। कृष्ण अर्जुन को अपने क्षत्रिय धर्म की याद दिलाते हुए कहते हैं कि शरीर के मोह में पड़कर युद्ध से भागना उचित नहीं है।