य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ 2.19 ॥
जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसे मरा हुआ मानता है, वे दोनों ही अज्ञानी हैं; क्योंकि यह आत्मा न तो किसी को मारता है और न ही किसी के द्वारा मारा जाता है।
विस्तार: यह आत्मा के वास्तविक स्वभाव का निरूपण है। हिंसा केवल शरीर की होती है, चेतना की नहीं। यदि अर्जुन सोचता है कि वह अपने पितामह को मार रहा है, तो वह गलत है। आत्मा तो जन्म-मृत्यु के इन कार्यों से ऊपर है। यह ज्ञान अर्जुन के भीतर से हत्या के पाप का भय निकालने के लिए दिया गया है।