श्रीभगवानुवाच ।
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥ 2.2 ॥
श्री भगवान ने कहा: हे अर्जुन! इस विषम समय में तुम्हारे मन में यह मोह (कलुषता) कहाँ से आ गया? यह व्यवहार न तो श्रेष्ठ पुरुषों के योग्य है, न ही स्वर्ग देने वाला है और न ही इससे कीर्ति प्राप्त होगी।
विस्तार: भगवान कृष्ण यहाँ अर्जुन को झकझोरते हैं। वे उसे याद दिलाते हैं कि एक योद्धा के लिए युद्ध के मैदान में इस तरह का मोह कायरता है। वे स्पष्ट करते हैं कि अर्जुन का यह व्यवहार उसके सम्मान और भविष्य दोनों के लिए हानिकारक है।