॥ अध्याय 2, श्लोक 21 की व्याख्या ॥

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥ 2.21 ॥

भावार्थ (Hindi Explanation)

हे पार्थ! जो मनुष्य इस आत्मा को अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अव्यय (अविकारी) जानता है, वह पुरुष भला किसको कैसे मरवाता है और कैसे किसी को मारता है?

विस्तार: यहाँ कृष्ण एक तार्किक प्रश्न पूछ रहे हैं। यदि आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते और वह कभी मरता नहीं, तो वध की धारणा केवल एक भ्रम है। जब आत्मा अविनाशी है, तो न कोई मारने वाला है और न ही कोई मरने वाला। ज्ञानी व्यक्ति यह जानकर अपने कर्तव्यों का पालन बिना किसी पापबोध के करता है।

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