॥ अध्याय 2, श्लोक 22 की व्याख्या ॥

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ 2.22 ॥

भावार्थ (Hindi Explanation)

जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्र धारण कर लेता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त करता है।

विस्तार: यह श्लोक पुनर्जन्म के सिद्धांत को एक अत्यंत सरल उदाहरण से समझाता है। जैसे वस्त्र केवल बाहरी आवरण हैं और उनके फटने पर हम उन्हें बदल लेते हैं, शरीर भी आत्मा का केवल एक आवरण है। मृत्यु केवल एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने का संक्रमण (Transition) है। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति मृत्यु से नहीं डरते।

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