अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥ 2.25 ॥
यह आत्मा इन्द्रियों द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता (अव्यक्त), यह मन द्वारा सोचा नहीं जा सकता (अचिन्त्य) और यह कभी बदलता नहीं (अविकारी)। अतः इस आत्मा को ऐसा जानकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
विस्तार: कृष्ण यहाँ ज्ञान योग का सार प्रस्तुत करते हैं। चूँकि आत्मा भौतिक सीमाओं (इन्द्रिय, मन, बुद्धि) से परे है, इसलिए उस पर सांसारिक हथियारों या घटनाओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। जब तुम यह जान लेते हो कि तुम्हारे प्रियजनों की असली पहचान यह अविनाशी आत्मा ही है, तब शोक करने का कोई कारण नहीं रह जाता।