स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ 2.31 ॥
अपने स्वधर्म (क्षत्रिय धर्म) को देखते हुए भी तुम्हें विचलित नहीं होना चाहिए; क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्म-युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी मार्ग नहीं है।
विस्तार: यहाँ से कृष्ण 'सांख्य योग' से 'कर्म योग' की ओर बढ़ रहे हैं। वे अर्जुन को याद दिलाते हैं कि वह एक योद्धा है। एक योद्धा का परम कर्तव्य अन्याय के खिलाफ लड़ना है। कृष्ण कहते हैं कि यदि अर्जुन इस युद्ध से भागता है, तो वह न केवल अपने कर्तव्य से विमुख होगा, बल्कि अपना सम्मान भी खो देगा।