यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ 2.32 ॥
हे पार्थ! अपने आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यशाली क्षत्रिय ही प्राप्त करते हैं।
विस्तार: कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि यह युद्ध उसने स्वयं नहीं चुना, बल्कि अधर्म के विनाश के लिए यह अवसर उसे ईश्वर की कृपा से प्राप्त हुआ है। एक योद्धा के लिए न्याय के लिए लड़ना सीधे स्वर्ग जाने के मार्ग के समान है। ऐसे धर्म-युद्ध का अवसर मिलना बड़े सौभाग्य की बात मानी जाती है।