सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥ 2.38 ॥
सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान मानकर तुम युद्ध के लिए तैयार हो जाओ; इस प्रकार युद्ध करने से तुम्हें पाप नहीं लगेगा।
विस्तार: यहाँ कृष्ण 'समत्व' (Equanimity) का उपदेश दे रहे हैं। वे अर्जुन को फल की चिंता छोड़कर केवल कर्तव्य पर ध्यान केंद्रित करने को कह रहे हैं। जब हम किसी कार्य को बिना किसी स्वार्थ या डर के केवल अपना कर्तव्य मानकर करते हैं, तो उस कार्य के परिणाम हमें मानसिक रूप से विचलित नहीं करते और न ही हमें कोई पाप लगता है।