एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥ 2.39 ॥
हे पार्थ! यह बुद्धि (ज्ञान) मैंने तुम्हें 'सांख्य' (ज्ञानयोग) के विषय में बताई है। अब तुम इसे 'योग' (कर्मयोग) के विषय में सुनो, जिस बुद्धि से युक्त होकर तुम कर्मों के बंधन को पूरी तरह से काट सकोगे।
विस्तार: कृष्ण यहाँ एक महत्वपूर्ण मोड़ ले रहे हैं। अब तक उन्होंने आत्मा की अमरता (ज्ञान) के बारे में बताया। अब वे उस ज्ञान को क्रिया (Action) में बदलने का तरीका बता रहे हैं। कर्मयोग वह तकनीक है जिससे व्यक्ति संसार में रहकर और सारे काम करते हुए भी उनके आध्यात्मिक बोझ (बंधन) से मुक्त रह सकता है।