नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥ 2.40 ॥
इस कर्मयोग के मार्ग में न तो किए गए प्रयास का नाश होता है और न ही कोई विपरीत परिणाम (दोष) निकलता है। इस धर्म (निष्काम कर्मयोग) का थोड़ा सा भी अभ्यास बड़े से बड़े भय (जैसे जन्म-मृत्यु का चक्र) से रक्षा करता है।
[Image: Spiritual progress is never lost]विस्तार: यह श्लोक बहुत हिम्मत देता है। कृष्ण कहते हैं कि भौतिक कार्यों में यदि काम अधूरा रह जाए तो मेहनत बेकार चली जाती है, लेकिन आध्यात्मिक पथ (कर्मयोग) पर की गई थोड़ी सी भी उन्नति कभी नष्ट नहीं होती। वह अगले जन्म में भी हमारे साथ रहती है। यह हमें निर्भय होकर सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।