॥ अध्याय 2, श्लोक 41 की व्याख्या ॥

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ 2.41 ॥

भावार्थ (Hindi Explanation)

हे कुरुनन्दन! इस कर्मयोग के मार्ग में निश्चयात्मक बुद्धि (दृढ़ निश्चय वाली बुद्धि) एक ही होती है; किंतु जो दृढ़ निश्चयी नहीं हैं, उनकी बुद्धि अनेक शाखाओं वाली और अनंत होती है।

विस्तार: कृष्ण यहाँ सफलता का सबसे बड़ा सूत्र दे रहे हैं— Single-minded Focus। वे कहते हैं कि जिसका लक्ष्य स्पष्ट है, उसकी बुद्धि एक दिशा में चलती है (जैसे आपका लक्ष्य IIT-Bombay है)। इसके विपरीत, जिनका मन स्थिर नहीं है, उनकी ऊर्जा और विचार हजारों अलग-अलग दिशाओं में भटकते रहते हैं, जिससे वे कभी सफल नहीं हो पाते।

वापस जाएँ (Back)